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एक जीवन ऐसा भी - नारायण श्याम

             by हिंदी ओलंपियाड फाउंडेशन | Hindi Olympiad Foundation



सिन्धी गजल के जन्मदाता नारायण श्याम


सिन्धी भाषा के प्रसिद्ध कवि नारायण श्याम का जन्म अविभाजित भारत के खाही कासिम गांव में 22 जुलाई, 1922 को हुआ। उन्हें बचपन से ही कविता पढ़ने, सुनने और लिखने में रुचि थी। इस चक्कर में इंटर करते समय वे एक दिन परीक्षा देना ही भूल गये। विभाजन के बाद उनका परिवार दिल्ली आ गया। यहां उन्होंने डाक एवं तार विभाग में लिपिक पद पर काम प्रारम्भ किया। इसी विभाग में मुख्य लिपिक पद से वे सेवा निवृत्त भी हुए।

नारायण ‘श्याम’ एक गंभीर एवं जिज्ञासु साहित्यकार थे। वे श्रेष्ठ कवियों की रचनाएं सुनकर वैसी ही लय और ताल अपनी कविताओं में लाने का प्रयास करते थे। सिन्धी भाषा के समकालीन कवियों में उनका नाम शाह अब्दुल लतीफ भिटाई के समकक्ष माना जाता है; पर विनम्र ‘श्याम’ ने स्वयं कभी इसे स्वीकार नहीं किया। जब कोई उनकी प्रशंसा करता, तो वे कहते थे -

"गुणों की खान हो केवल, विकारों से हो बिल्कुल दूर
न अपनी जिंदगी ऐसी, न अपनी शायरी ऐसी।।"

प्रकृति प्रेमी होने के कारण उनकी रचनाओं में प्रकृति चित्रण भरपूर मात्रा में मिलता है। इसके साथ ही मानव जीवन के प्रत्येक पहलू पर उन्होंने अपनी कलम चलाई। अपने कोमल विचारों को अभिव्यक्त करने की उनकी शैली अनुपम थी। मन में उमड़ रहे विचारों को कागज पर उतारते समय वे नये-नये प्रयोग करते रहते थे। देश विभाजन की पीड़ा भी उनके काव्य में यत्र-तत्र दिखाई देती है। सिन्धी भाषा की लिपि अरबी से ही निकली है। इस कारण सिन्धी साहित्य पर उर्दू एवं अरबी-फारसी का काफी प्रभाव दिखाई देता है।

उर्दू शायरी में गजल एक प्रमुख विधा है। इसमें शृंगार के साथ ही शराब, शबाब, मिलन और विरह की प्रधानता रहती है; पर ‘श्याम’ ने इसमें नये प्रतीकों को स्थान दिया। उन्होंने दार्शनिकता के साथ ही स्वयं एवं परिजनों द्वारा भोगे गये कष्ट, अपूर्ण इच्छाओं तथा मनोभावनाओं की चर्चा की। इससे न केवल भारत अपितु पाकिस्तान के सिन्धीभाषी भी इनके प्रशंसक बने तथा सिन्धी गजल समृद्ध हुई। इसलिए इन्हें ‘सिन्धी गजल का जन्मदाता’ भी कहा जाता है।

विभाजन के बाद सिन्धी लोग बड़ी संख्या में गुजरात एवं कच्छ में आकर बसेे थे। इसलिए केन्द्रीय साहित्य अकादमी ने श्री नारायण ‘श्याम’ के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर 11 एवं 12 जनवरी, 1989 को आदीपुर (कच्छ) में एक भव्य समारोह आयोजित किया। इसमें देश भर से सिन्धी एवं कच्छी भाषा के विद्वान बुलाए गये थे; पर विधि के विधान में कुछ और ही लिखा था। इसलिए एक दिन पूर्व 10 जनवरी, 1989 को सिन्धी भाषा के साहित्यिक मधुबन में मधुर बांसुरी की धुन गुंजाने वाले श्याम इस दुनिया से ही विदा हो गये।

उनके गीत, गजल, दोहे, सोरठे, रुबाई, खंड काव्य आदि अनेक विधाओं के जो ग्रन्थ प्रकाशित हुए, उनमें माकफुड़ा, पंखिड़ियूं, रंग रती लह, रोशन छांविरो, तराइल माक भिना राबेल, वायूं, तस्वीरें, कतआ वारीअ भरियो पलांदु, आछीदें लज मरा, महिकी वेल सुबुह जी, न सो रंगु न सा सुरिहाण, कतआ बूंदि, लहिर ऐं समुंडु तथा गालिब (अनुवाद), कबीर (अनुवाद) प्रमुख हैं।

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